अपनी भुमिका निर्वाह के लिए बल प्रदान करता है धर्म – अवधेशानन्द जी महाराज

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जीवन का पहला पुरूषार्थ धर्म है। धर्म के बिना जीवन में प्राप्त स्वरूप, सिद्धि ईहलोक और परलोक सभी अमान्य है। धर्म से अर्थ नियन्त्रित होता है, उससे कामनाएं सीमित होगी, जिससे भोग वृति पर अंकु श लगेगा और मोक्ष यानि आनन्द की प्राप्ति की प्राप्ति होगी। उक्त उद्गार व्यक्त करते हुए वैदिक परम्परा के पोषक परम पूज्य जूनापीठाधीश्वर आचार्य महामण्डलेश्वर स्वामी श्री अवधेशानन्द गिरी जी महाराज ने कहा धर्म से चेतना, ममता, जन्म, फलीभुत होती है।

सालासर धाम में लक्ष्मणगढ़ मार्ग पर अंजनी माता मन्दिर के पास नवनिर्मित चमेलीदेवी अग्रवाल सेवा सदन के नजदीक स्थित पंचवटी में मां चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वाधान में आयोजित राम कथा में उपस्थित जनों को कथा का अमृतपान करवाते हुए  जुनापीठाधीश्वर ने कहा कि बिना धर्म के मन घोड़े के समान दौड़ता है और ऊंट के समान कब किस करवट बैठ जाये पता ही नहीं चलता है। महाराज ने कहा कि जो धर्म के मर्म को नहीं जानते वे धर्म का विरोध करते हैं। धर्म को अलौकिक वस्तु बताते हुए स्वामी जी ने कहा कि जब जब धर्म का हास होता है तब स्वयं भगवान आते हैं तथा जहां धर्म है, वहीं जय और विजय है।

महाराज ने कहा कि आज हम अपना पुत्र, पिता, पड़ौसी, सेवक, मालिक, पति, पत्नि के धर्म को भुल गये हैं। धर्म अपनी भुमिका निर्वाह के लिए बल प्रदान करता है। धर्म वर्तमान को श्रेष्ठ बनाता है और प्रेरित करता है। धर्म से विमुख होने पर रचनात्मक जीवन नहीं बना पाओगे। महाराज ने कहा कि जीवन वर्तमान में रहता है, न बीते कल में और ना ही आने वाले पल में रहता है। अवधेशानन्द जी महाराज ने कहा कि जब आगे बढऩे का उत्साह समाप्त हो जाये तो समझना आपका धर्म समाप्त हो गया है। इस लोक में हारने वाला परलोक में कैसे विजयी होगा। वर्तमान और भविष्य दोनो को ठीक करने वाला धर्म ही है। धर्म से सकारात्मक सोच बनी रहेगी तथा धर्म शुभ कर्मों में संलग्न रहता है। उन्होने कहा कि भोगने की कला सीख लेंगे तब ही अलग हुआ जा सकेगा। त्यागपूर्वक भोगना सीखोगे तब ही धर्म बचेगा।

महाराज ने कहा कि धर्म आयेगा तभी संतुलन होगा और सीमायें तय होगी। उन्होने कहा कि प्रसन्नता पदार्थ में नहीं है, सुख साधन में नहीं है। राम को धर्म का साक्षात विग्रह बताते हुए स्वामी जी ने कहा कि धर्म जीवन है, इसे जीना होता है। उन्होने कहा कि भारत में पहला और अंतिम स्वर राम है। घृणा, ईष्र्या, उद्वेग में राम हैं और राम प्राण है, संस्कृति का घोष राम है तो आध्यात्मिकता एवं दार्शनिकता कृष्ण है। राम राजतिलक की कथा कहते हुए महाराज ने कहा कि भौतिकता एवं लौकिकता का प्रभाव पड़ता है, जो कुछ देर के लिए होता है। परन्तु राम के जैसा प्रभाव और स्वभाव किसी के पास नहीं है। उन्होने कहा कि बड़ा काम करने से पहले पांच लोगों से पुछना चाहिए। उन्होने राजतिलक की कथा का श्रवण करवाते हुए कहा कि राजा दशरथ ने भी जब राम के राजतिलक का निर्णय लिया था, तब वेद, शास्त्र, लोक, सचिव एवं परिवार की राय जानी थी।

महाराज ने कहा कि दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता, उसके चाहे कितने ही टुकड़े क्यों न कर दें। महाराज ने कहा कि अगर वेद और शास्त्र सही ठहराते हैं लेकिन लोक उस कार्य को सही नहीं मानता है तो उस काम को नहीं करना चाहिए तथा अपने परिवार को विश्वास में लेकर ही काम करें तथा जिसमें सबका हित हो वही कार्य करें। महाराज ने कहा कि जब तक अभिष्ट व शुभ कार्य की पूर्णता नहीं होती है, तब तक व्रत रखें। कथा प्रारम्भ होने से पूर्व व्यास पीठ व रामायण जी का पूजन मुख्य यजमान श्रीमती नीना अग्रवाल एवं श्री विनोद अग्रवाल ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ किया। प्रेमलता-जयप्रकाश गर्ग, अनिता- रोशन गोयल, मूलसिंह शेखावत, दातार कंवर, सुशील केडिया, पन्नालाल राठौड़, उम्मेद कंवर, मायादेवी गोयल, प्रवीण चौधरी, रविशंकर पुजारी, मिठालाल पुजारी ने महाराज का स्वागत किया।

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